एक छोटे से गाँव में नील नाम का लड़का रहता था। गर्मी का मौसम अपने चरम पर था। पेड़ों की पत्तियाँ तक चुप थीं और हवा जैसे आग लेकर चल रही थी—वही झुलसाने वाली लू।
नील को पतंग उड़ाने का बहुत शौक था। उसकी दादी रोज़ समझातीं, “दोपहर में बाहर मत जाना, ये हवा ठीक नहीं है।” लेकिन नील को लगा कि दादी बस डराती हैं।
एक दिन उसने चमकीली नई पतंग ली और चुपके से छत पर चढ़ गया। आसमान साफ था, पतंग ऊँची उड़ने लगी। नील खुश होकर दौड़-दौड़कर डोर संभाल रहा था। तभी अचानक तेज़ लू का झोंका आया। उसका गला सूखने लगा, सिर भारी हो गया, और आँखों के आगे धुंध छा गई।
कुछ ही पलों में नील बैठ गया, फिर लेट गया। पड़ोस की चाची ने उसे देखा और तुरंत नीचे लाकर ठंडे पानी से उसका माथा पोंछा। दादी ने नींबू-पानी बनाया, उसे छाँव में लिटाया और आराम करवाया।
शाम तक नील की हालत सुधर गई। वह चुपचाप दादी के पास बैठा रहा। धीरे से बोला, “अब समझ आया, ये हवा खेल नहीं है।”
उस दिन के बाद नील ने सिर्फ सुबह या शाम को ही पतंग उड़ाई। वह अपने दोस्तों को भी समझाने लगा कि लू से बचाव कितना ज़रूरी है—पानी पीना, सिर ढकना और दोपहर की धूप से दूर रहना।
सीख:
प्रकृति के संकेतों को नजरअंदाज करना नुकसानदेह हो सकता है—सावधानी ही सुरक्षा है।