एक प्राचीन नगर में एक वृद्ध मूर्तिकार रहता था। उसकी बनाई मूर्तियाँ इतनी जीवंत होती थीं कि लोग कहते, "इन पत्थरों में भी साँसें बसती हैं।"
एक दिन उसका शिष्य बोला,
"गुरुजी, मैं भी आपकी तरह महान मूर्तिकार कब बनूँगा?"
गुरुजी मुस्कुराए, उसे एक साधारण पत्थर दिया और केवल इतना कहा,
"आज इस पत्थर से बात मत करना, इसे तराशना।"
शिष्य ने दिन-रात मेहनत शुरू कर दी। हर बार जब वह पूछता,
"क्या अब मैं सफल हो गया?"
गुरुजी का उत्तर वही होता,
"छेनी चलाते रहो, समय खुद जवाब देगा।"
महीने बीत गए... फिर साल गुजर गए।
एक दिन शिष्य ने एक ऐसी मूर्ति बनाई जिसे देखकर लोग मंत्रमुग्ध रह गए। दूर-दूर से लोग उसकी कला देखने आने लगे। उसकी प्रशंसा पूरे नगर में होने लगी।
उस रात शिष्य ने गुरुजी से पूछा,
"गुरुजी, आपने इतने वर्षों तक मुझे कभी सफलता का शॉर्टकट क्यों नहीं बताया? हर बार सिर्फ मेहनत करने को ही क्यों कहा?"
गुरुजी ने शांत स्वर में उत्तर दिया,
"बेटा, जो हर दिन अपनी मंज़िल के बारे में बोलते रहते हैं, वे अपनी ऊर्जा शब्दों में खर्च कर देते हैं। लेकिन जो बिना शोर किए अपने काम से रिश्ता निभाते हैं, उनकी मेहनत एक दिन ऐसी आवाज़ बन जाती है जिसे पूरी दुनिया सुनती है।"
फिर उन्होंने शिष्य की मूर्ति की ओर इशारा करते हुए कहा,
"याद रखना... छेनी की हर छोटी चोट दिखाई नहीं देती, लेकिन वही अनगिनत चोटें मिलकर पत्थर को साकार बना देती हैं। इंसान भी अपनी रोज़ की छोटी-छोटी मेहनत से महान बनता है, बड़े दावों से नहीं।"
सीख:
पहचान शब्दों से नहीं, कर्मों से बनती है। कम बोलो, निरंतर सीखो और इतनी ईमानदारी से मेहनत करो कि एक दिन तुम्हारी सफलता ही तुम्हारा परिचय बन जा