नदी के उस पार

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नदी के उस पार

गाँव के किनारे एक शांत नदी बहती थी। लोग कहते थे — “जो इस नदी को पार कर लेता है, वह जीवन को समझ जाता है।”

लेकिन सच यह था कि नदी पार करना आसान नहीं था। पानी कभी शांत होता, कभी तूफ़ानी। ठीक जीवन की परेशानियों की तरह।

उसी गाँव में एक लड़का रहता था — नीर।

नीर बचपन से ही संघर्षों के बीच बड़ा हुआ। उसके घर की दीवारें मिट्टी की थीं, लेकिन उनमें हर दिन झगड़ों की आवाज़ गूंजती थी। उसके दादा-दादी अक्सर उसकी माँ को ताने देते, छोटी-छोटी बातों पर अपमान करते। नीर के पिता दादा दादी की ही हर बात मानते चाहे वो सही कहैं या गलत । शायद उन्हें सही और गलत समझने में समय लग रहा था।

धीरे-धीरे उसकी माँ टूटने लगी।

एक दिन ऐसा आया जब वह मानसिक रूप से बीमार हो गईं। घर में अंधेरा छा गया। नीर को उसके भाई बहन को दो वक्त की roti मिलना मुश्किल हो गया  । उसने बस एक चीज बनाना सीखी थी वो भी हलबा तो उनके घर में घी साकार की कमी नहीं रहती थी तो बस वो हलवा बन लेता खुद खा लेता और भाई बहन को खिला देता पर उसके भाई बहन को ज्यादा अच्छा नहीं लगता हलवा तो दादी दादी बुआ से रोटी ले कर खा लेते कभी तो अच्छे से रोटी दे देते वो लोग कभी झल्ला जाते। । 

लेकिन नीर हर रात अपनी माँ के पास बैठकर कहता,

“माँ, अंधेरा चाहे कितना भी बड़ा हो… सुबह ज़रूर आती है।”

समय बीता। उसकी माँ थोड़ी ठीक हुईं। नीर ने सोचा अब शायद जीवन आसान हो जाएगा। पर जीवन तो नदी की तरह था — एक लहर जाती, दूसरी आ जाती।

 

अब दादा चल बसे और दादी अकेली हो गई यह से एक लहर रुकी दूसरी स्टार्ट हो गई उसका छोटा भाई जीजा के कहने में आ गया कि शादी कर दो वो कहत है नीर से अरे ये बड़े हैं न खुद शादी  कर रहे न मुझे करने दे रहे। उसे लग रहा था शादी ही सब कुछ है मम्मी भी उसकी बातों में आ गई और नीर पर प्रेसर बनाया कि देखा ले कोई लडकी तेरे छोटा भाई भी बैठा है शादी के लिए फिर क्या अब नीर ने सोचा कि ये लोग प्रेशर तो बना ही रहे है तो अच्छी  लड़की देख शादी कर लेता हूं अभी मम्मी को सपोर्ट भी मिल जाएगा।  उसकी  

शादी के बाद उसके भाई-बहन बिना वजह उससे जलने लगे लड़ने झगड़ने लगे ।  नीर और उसकी पत्नी से जलने लगे यह तक उनके बच्चों से भी जलते लगे कोई उसकी मेहनत नहीं देखता था, बस उसकी छोटी-सी खुशी भी उन्हें चुभती थी। नीर  ने प्राइवेट नौकरी शुरू की। तनख्वाह कम थी, जिम्मेदारियाँ बड़ी।

एक तरफ घर के ताने, दूसरी तरफ बच्चों की परवरिश।

कई बार रात को वह चुपचाप छत पर बैठ जाता और सोचता —

“क्या सच में मेहनत करने वालों की जिंदगी इतनी कठिन होती है?”

फिर खुद ही जवाब देता —

“नदी पार करने वाले किनारे पर खड़े होकर शिकायत नहीं करते… वे तैरना सीखते हैं।”

धीरे-धीरे उसने सबको उनके हाल पर छोड़ दिया।

दादा अब इस दुनिया में नहीं थे। दादी बुढ़ापे में बदल गई थीं। उन्हें अपनी गलतियों का एहसास होने लगा। उसके पिता भी अब समझने लगे थे कि कौन अपना है और कौन सिर्फ स्वार्थी।

लेकिन उसके भाई आज भी उसी जगह है।

पापा ने उसकी  शादी कर दी शादी को दो दिन नहीं हुए दो मंजिला मकान में वह सेकेंड  फ्लोर पर अलग रहने लगा जिससे उसकी पत्नी को काम का जोर न पड़े  मम्मी पापा को खाना न बनाकर न खिला पड़े , उसके जरा भी नहीं सोचा कि बड़े भाई और उसकी पत्नी ने १० साल घर  को संभाला , वो तो मतलबी अलग हो गया , अलग तो हो गया पर हर महीने पापा से  ५-१० हजार रुपए तो ऐंठ ही लेता था  कोई काम नहीं करता , कोई काम का बोलता तो कहता की  मेरा बाप काम रहा है मुझे क्यों  काम  करना , एक दिन तो हद ही हो गई जब उसकी मानसिक रूप से बीमार मां ने कोई गलती की तो उसके पिता ने मां को डांटा तो उसका छोटा भाई जो कामचोर  हो चुका था पिता को मारने आ गया नीर ने बचाया ।

नीर समझ चुका था कि इसकी  जलन बहुत बढ़ गई है  अब ये आक्रामक हो गया है पैसे की चमक ने अंधा कर दिया पापा उसे महीना के खर्च के बाद और पैसा नहीं दिया (इस गुस्से में उसने पिता पर डंडा उस

थका उन्हें मारने आया ) वो तो नीर नहीं होता तो वो उन्हें डंडा  मार ही देता । 

मम्मी से कभी भी नीर कहता की ये छोटा  भाई काम क्यों नहीं करता वो  छोटे भाई को ज्यादा कमजोर मानती थी इसलिए साथ देती थी। इन बातों पर मम्मी कहती कि तू भी मत कर 

नीर   मुस्कुरा देता।

क्योंकि स्वाभिमान उसके लिए रोटी से बड़ा था।

वह खुद कमाता, अपने बच्चों को पढ़ाता, अपने परिवार का पालन करता।

उसने कभी किसी का हक नहीं छीना।

लेकिन उसके भाई बहिन ने हालात इतने बिगाड़ दिए , मम्मी को बोल बोल कर की भाईसाब ही पापा का पैसा खा रहे है हमे कुछ नहीं मिल रहा और जबकि ऐसा था नहीं वो पिता के  घर में रहते हुए अपना और बच्चों का  खर्च  खुद ही उठाता था और  इतना ही नहीं  घर का  इलेक्ट्रिसिटी बिल और मोबाइल रिचार्ज करता था  एक दिन हालात  इतने बिगड़ कि उसकी मानसिक रूप से बीमार माँ ने भी छोटे भाई बहिन की बातों में आकर  गुस्से में उसे घर से निकाल दिया।

उस रात बारिश बहुत तेज़ थी।

नीर  सड़क पर खड़ा था। हाथ में एक छोटा बैग, साथ में पत्नी और बच्चे।

आँखों में दर्द था… मगर दिल में नफ़रत नहीं।

उसकी पत्नी ने पूछा —

“इतना सब होने के बाद भी तुम सबकी इज़्ज़त क्यों करते हो?”

नीर  ने आसमान की तरफ देखा और धीरे से कहा —

“क्योंकि दूसरों की गलतियाँ मेरे संस्कार नहीं बदल सकतीं।”

उस दिन उसने किराए के एक छोटे कमरे से नई शुरुआत की।

कमरा छोटा था, मगर वहाँ अपमान नहीं था।

रोटी साधारण थी, मगर उसमें मेहनत की मिठास थी।

नीर ने खूब मेहनत की और अपने लिए एक घर खरीदा वो भी बिल्कुल उसी घर जैसा जिसमें से उसकी मां ने निकाला था । 

वर्षों बाद…

उसी गाँव के लोग अपने बच्चों को नीर  का उदाहरण देने लगे।

“देखो, कठिनाइयाँ इंसान को तोड़ने नहीं, मजबूत बनाने आती हैं।”

नीर अब सफल था।

उसके बच्चे पढ़-लिखकर अच्छे इंसान बने।

और सबसे बड़ी बात — उसने अपने दर्द को नफ़रत नहीं बनने दिया।

एक दिन वह उसी नदी के किनारे खड़ा था। पानी आज भी बह रहा था।

वह मुस्कुराया और बोला —

“ज़िंदगी में परेशानियाँ हमेशा आती रहेंगी।

एक जाएगी, दूसरी आएगी।

लेकिन हार मान लेना समाधान नहीं।

नदी कभी किसी के लिए रुकती नहीं…

उसे पार वही करता है जो डरकर किनारे पर खड़ा नहीं रहता।”

सीख

कठिनाइयाँ जीवन का अंत नहीं, नई शुरुआत होती हैं।

जो इंसान दर्द में भी सम्मान देना नहीं छोड़ता, वही असली विजेता होता है।

हालात चाहे जैसे हों, स्वाभिमान और मेहनत इंसान को एक दिन ज़रूर ऊँचा उठाते हैं।