मंजिल साफ दिखे तो रास्ता मायने नहीं रखता

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मंजिल साफ दिखे तो रास्ता मायने नहीं रखता

एक समय की बात है में ऑफिस से आ रहा था ऑटो बहुत भरा था, बैठने की जगह भी मुश्किल से मिली।
पर मजबूरी नहीं थी , मेरा लक्ष्य बड़ा था — ट्रेन जो पकड़नी थी।
तब समझ आया ,
जब मंज़िल साफ दिखाई देने लगती है,
तो रास्तों की तकलीफ़ें मायने नहीं रखतीं।
सफर तंग हो सकता है,
लेकिन हौसले हमेशा खुले होने चाहिए।”

“जगह कम थी, भीड़ ज़्यादा थी,
पर मंज़िल सामने थी।
तब जाना —
अगर लक्ष्य दिख रहा हो,
तो रास्ते नहीं, सिर्फ़ कदम मायने रखते हैं।”